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Tag: हिंदी

हमने दिल और तेरे हाथ में पत्थर रक्खा

हमने दिल और तेरे हाथ में पत्थर रक्खा,
जब कि ये हमने बहुत सोच समझ कर रक्खा.

याद रखना कि ये शीशे की तरह टूट न जाए,
दिल ये महफ़ूज़ अभी तक था जहाँ पर रक्खा.

अब हिफ़ाज़त की रही तुझपे ही ज़िम्मेदारी,
अब तलक हमने ख़याल इसका बराबर रक्खा.

क्या कहा इश्क़ में कोताही किया करता हूँ,
तूने मुझ पर ग़लत इल्ज़ाम सरासर रक्खा.

हम में से किसने सरेआम तअल्लुक तोड़ा,
दुनिया ने देख तेरे नाम को बरतर रक्खा.

✍🏼 अली हसनैन

ہم نے دل اور تیرے ہاتھ میں پتھر رکھا،
جب کہ یہ ہم نے بہت سوچ سمجھ کر رکھا.

یاد رکھنا کہ یہ شیشے کی طرح ٹوٹ نہ جائے،
دل یہ محفوظ ابھی تک تھا جہاں پر رکھا.

اب حفاظت کی رہی تجھپے ہی ذمہ داری،
اب تلک ہم نے خیال اس کا برابر رکھا.

کیا کہا عشق میں کوتاہی کیا کرتا ہوں،
تو نے مجھ پر غلط الزام سراسر رکھا.

ہم میں سے کس نے سرعام تعلق توڑا،
دنیا نے دیکھ تیرے نام کو برتر رکھا.

✍🏼 علی حسنین

 

नये सांचों में ढलने का इरादा लेके आये हैं

तेरे हमराह चलने का इरादा लेके आये हैं,
नये सांचों में ढलने का इरादा लेके आये हैं।

कहाँ तक गम उठायेंगे खुशीकी आरजु लेकर,
मुकद्दर को बदलने का इरादा लेके आये हें ।

उन्हें पाने की हसरत में भटकते हम रहें कबतक,
ये फुरकत से निकलने का इरादा लेके आये है ।

चलो अच्छा हुवा तुमने हमारे हाल को समाजा,
तेरी उल्फत में पलने का इरादा लेके आये हैं ।

महोबत करने वाले भी बगावत पे उतर आये,
हकिकत में संभलने का इरादा लेके आये हैं ।

मिले हैं वो हमें जबसे उमीदें बढ गइ मासूम,
नये सपनों में ढलने का इरादा लेके आये हैं ।

✍🏼 मासूम मोडासवी

 

राह में आँखें बिछाये बैठा हूँ

चमन से उठ के सरे राह आये बैठा हूँ।
न जाने दिल कहाँ अपना गँवाये बैठा हूँ

पलक पे अपनी सितारे सजाये बैठा हूँ
ये किसकी याद को दिल से लगाये बैठा हूँ

तुम्हारी याद से पुरनूर सिर्फ़ दिल ही नहीं
अँधेरी रात को भी जगमगाये बैठा हूँ

जुनूँ है ये कि सनक है कि कैफ़ियत कोई
मैं अपने आप से भी ख़ार खाये बैठा हूँ

ये अलमियाँ है कि उसको मिरी ख़बर ही नहीं
मैं जिसकी राह में आँखें बिछाये बैठा हूँ

चले भी आओ मिरा और इम्तिहान ना लो
मैं अपने जिस्म को आँखे बनाये बैठा हूँ*

✍🏼 सागर त्रिपाठी

 

तू गुनगुनाये तो

तू गुनगुनाये तो ग़ज़ल पे निख़ार आ जाता है,
बदली बरसती है, खिज़ा पे ज़माल आ जाता है।

दिल धड़कता है हर पल, साँसें तेज चलती हैं ,
चाँदनी के नाजुक जिस्म में, उबाल आ जाता है।

अज़नबी की तरह मिल जाए तू किसी मोड़ पर,
बिखरे रिश्तों के, लम्हों का ख्याल आ जाता है।

जवानी के जोश में नादानियाँ कौन नहीं करता ?
जुबाँ पे मेरी यही दर्द भरा सवाल आ जाता है।

हम थे जो तूफानों का रुख मोड़ दिया करते थे,
आज तो किनारों पर भी भूचाल आ जाता है।
*
✍🏼 कृष्णकांत भाटिया ‘कान्त ‘

 

में अपनी दोस्ती को शहर में

में अपनी दोस्ती को शहर में रुस्वा नहीं करती
महोबत में भी करती हुं मगर चर्चा नहीं करती

जो मिलने आ जाये में उसकी दिलसे खादीम हुं ,
जो उठके जाना चाहे में उसे रोका नहीं करती

जीसे में छोड़ देती हुं उसे फीर भुल जाती हुं ,
फीर उसकी जानिब में कभी देखा नहीं करती

तेरा इसरार सर आंखों पर के तुमको भुल जाउं में,
में कोशिश कर के देखुंगी मगर वाअदा नहीं करती

✍🏼 परवीन शाकिर

 

खयालों में जीते हैं इन दिनो

उनसे जुड़े खयालों में जीते हैं इन दिनो,
कितने हसीं सवालों मे जीते हैं इन दिनो ।

जबसे मिले हैं आप बड़ी हसरतों से हम,
हमको मिले उजालों में जीते हैं इन दिनो ।

हरसू बहारें छा गइ जीनके विसाल की,
मनके हसींन जमालों में जीते है इन दिनो ।

आये हैं बनके आप मिरे रहेनुमां नफस,
तकदीर से ऐसे कमालों में जीते इन दिनो।

शाने पे उडते गेसुओं की सुरमइ छांव में,
बिखरे सीयाह बालों में जीते हैं इन दिनो।

पीछे है जीनके सारा जमाना लगा हुवा,
उनके हजारों पालो में जीते हैं इन दिनों ।

उनके करम से हस्ती की बदली हैं रोनकें।
मासूम हमवो खुशहालों में जीते हैं इन दिनो ।

✍🏼 मासूम मोडासवी

 

देखो सूर्य उगा पूरब में

देखो सूर्य उगा पूरब में ,
धरती का सुनापन हरने ..

ज्यों ज्यों सूरज चढ़ता जाता ,
(धरती) उसका रूप निखरता जाता ..

आतुर है वो पिया मिलन को,
सजी है मिलने अपने सजन को .

सर पे है हरियाली चुनर,
पंछी के कलरव के घूँघर..

इठलाती है , बलखाती है ,
थोडा थोड़ा शरमाती है ..

वो तो पगली सूर्य -प्यार में ,
तपती रहती इंतज़ार में ..

पर है सूर्य अभी भी व्यस्त
अपने काम में बिलकुल मस्त !

बिना मिले ही चलता जाता ,
पश्चिम की ओर ढलता जाता ..

देखो ये कैसा चित्तचोर,
सुना न उसके मन का शोर..

हाँ, अब आँखे लाल हुई है.
देखो ना फिर शाम हुई है…

वो न रुकेगा जान गई वो
खुद से हार मान गई वो..

उसने न रोका सूरज ढलते
सूरज बोला चलते-चलते..

“वादा है ये , निभाऊँगा मैं,
कल फिर मिलने आऊँगा मैं।”

✍🏼 शबनम

 

नजर ने धोके हजार खाये,

नजर ने धोके हजार खाये,
मगर नजर वो कहां बचाये।

अजब हमारा नसीब देखो,
कदम कदम पे अलमउठाये।

हवा शजर को गीरा न डाले,
खीजां उगलते मुहीब साये।

गरीब घरका जहीन बच्चा,
कदम कदम पे ठोकर खाये।

शजर खीजांकाअसीर होकर,
हवाकी जटको से न टुटजाये।

उमीद दर दर भटक रही है,
फरज करम का निखार पाये।

भरी तमन्ना मचल के मासूम,
नइ खुशी का जशन मनाये।

✍🏼 मासूम मोडासवी

 

हर तरफ तबाही के मन्ज़र बोहत है

हर तरफ तबाही के मन्ज़र बोहत है
ख़ुश्क आँखों मे भी समंदर बोहत है
हुकूमत कह रही है दंगो मे नुकसान नहीं हुआ
मगर बस्ती मे तो जले घर बोहत है

उन्हें रहनुमा कैसे तस्लीम कर ले
जो बाख़बर थे अब बेखबर बोहत है

मुझसे मिलते ही समन्दर नहीं करता गुरुर
इन आँखों मे उस जेसे समन्दर बोहत है

तख्तो ताज हुकूमत टोकरों मे रखते है
हम जेसे इस ज़माने मे कलन्दर बोहत है

वक़्त के साथ साथ जो चल न सके
ऐसे लोग आज दरबदर बोहत है

वो है जो अमन की ज़बान समझता ही नहीं
हमने फिर भी उड़ाये कबूतर बोहत है

हमारी जान तो उसने मोहब्बत मे ही ले ली
वेसे तो उसके पास खंज़र बोहत है

हँसते हँसते वतन पर जो कुर्बान हो जायें
मेरी कौम मे अभी ऐसे सर बोहत है

मेरा कलाम पढ़ के वो ये कहने लगा
ग़ालिब जेसे आज भी सुखनवर बोहत है

मेरे आका का मरतबा सबसे ऊंचा है
यूँ तो ज़माने मे आये पयम्बर बोहत है

जिसने भी सच की राह दिखलाई अज़ल से
ज़माने ने किये जुल्म उस पर बोहत है

आंधिया भी जिनका कुछ ना बिगाड़ पायी
हमारे आस पास ऐसे शज़र बोहत है

जिसे आदत है फूलो की मेरा साथ क्या देगा
मेरे घर तो काँटों के बिस्तर बोहत है

गुनाह पे गुनाह करने के बावजूद
उसकी नज़रे करम हम पर बोहत है

तुम अकेले ही नहीं थे सुन लो मियां
जंगेआजादी मे कटे हमारे भी सर बोहत है

तुम भी तो साबित करो कभी वफादारी
इल्ज़ाम तो तुम्हारे भी सर बोहत है

आसान नहीं है वसी इश्क़ की राहें इनमे
कँही ठोकरें तो कँही पत्थर बोहत है

✍🏼 वसी सिद्दीकी