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Tag: हिंदी ग़ज़ल

हमने दिल और तेरे हाथ में पत्थर रक्खा

हमने दिल और तेरे हाथ में पत्थर रक्खा,
जब कि ये हमने बहुत सोच समझ कर रक्खा.

याद रखना कि ये शीशे की तरह टूट न जाए,
दिल ये महफ़ूज़ अभी तक था जहाँ पर रक्खा.

अब हिफ़ाज़त की रही तुझपे ही ज़िम्मेदारी,
अब तलक हमने ख़याल इसका बराबर रक्खा.

क्या कहा इश्क़ में कोताही किया करता हूँ,
तूने मुझ पर ग़लत इल्ज़ाम सरासर रक्खा.

हम में से किसने सरेआम तअल्लुक तोड़ा,
दुनिया ने देख तेरे नाम को बरतर रक्खा.

✍🏼 अली हसनैन

ہم نے دل اور تیرے ہاتھ میں پتھر رکھا،
جب کہ یہ ہم نے بہت سوچ سمجھ کر رکھا.

یاد رکھنا کہ یہ شیشے کی طرح ٹوٹ نہ جائے،
دل یہ محفوظ ابھی تک تھا جہاں پر رکھا.

اب حفاظت کی رہی تجھپے ہی ذمہ داری،
اب تلک ہم نے خیال اس کا برابر رکھا.

کیا کہا عشق میں کوتاہی کیا کرتا ہوں،
تو نے مجھ پر غلط الزام سراسر رکھا.

ہم میں سے کس نے سرعام تعلق توڑا،
دنیا نے دیکھ تیرے نام کو برتر رکھا.

✍🏼 علی حسنین

 

में अपनी दोस्ती को शहर में

में अपनी दोस्ती को शहर में रुस्वा नहीं करती
महोबत में भी करती हुं मगर चर्चा नहीं करती

जो मिलने आ जाये में उसकी दिलसे खादीम हुं ,
जो उठके जाना चाहे में उसे रोका नहीं करती

जीसे में छोड़ देती हुं उसे फीर भुल जाती हुं ,
फीर उसकी जानिब में कभी देखा नहीं करती

तेरा इसरार सर आंखों पर के तुमको भुल जाउं में,
में कोशिश कर के देखुंगी मगर वाअदा नहीं करती

✍🏼 परवीन शाकिर

 

आज की शाम

कितना हसी हैं मौसमें-बहार आज की शाम,
आ रही हैं आसमाँ से फुआर आज की शाम!

ये बुँदे बारिश की गुमाँ करती होगी खुदपर,
भीग रहा हैं इनमे मेरा यार आज की शाम!

ये ठंडी हवाये, ये फ़िज़ा कहाँ से आ रही हैं,
यूँ भी हैं अपना दिल दो चार आज की शाम!

पूछा था किसी ने ग़ज़ल में मेहनत हैं क्या,
निकली जिस्म से खू की धार आज की शाम!

इन्हें नहाने दे, भीग जाने दे पूरी ही तरह,
रोकना इन्हें होगा नागवार आज की शाम!

उसकी खुशबु आ रही हैं वो पास ही हैं कहीं,
आई हैं हवा लेके उसका तार आज की शाम!

ये खुशनुमा शाम काश यही रुके तो मज़ा है,
ना रुकी तो दिल होगा बेज़ार आज की शाम!

जमीन-ए-हिन्द अगर मांगेगी खून मुझसे,
तो मैं हूँ जान देने को तैयार आज की शाम!

गुनगुना रहे हैं मेरे दोस्त भी गीत बारिश के,
गाकर ये भी हो गये गीतकार आज की शाम!

मैंने एकबार कहा की उठो सब एक हो जाओ,
पसीना-पसीना है सरकार आज की शाम!

जिंदगी हैं दोस्ताना गले सबसे मिलते चलो,
दोस्ती में ना लाओ तलवार आज की शाम!

शायद यूँ मैं बैठ गया हूँ आज बालकनी में,
काश हो जाए उसका दीदार आज की शाम!

चाँद नज़र उतारता होगा मेरी फलक से ही,
दुनिया में हैं कोई कलमकार आज की शाम!

ये शाम हसीन होने का फलसफा हैं शायद,
लिख दिए हैं बहुत अश्आर आज की शाम!

ना ‘तनहा’ किसी को अच्छा लगे ना बेहतर,
क्योकि वो खुद में हैं खुद्दार आज की शाम!

✍ तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

 

तेरी बातें ही सुनाने आये

तेरी बातें ही सुनाने आये
दोस्त भी दिल ही दुखाने आये

फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आये

ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आये

इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आये

अजनबी दोस्त हमें देख के हम
कुछ तुझे याद दिलाने आये

दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आये

अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आये

क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आये

आ ना जाए कहीं फिर लौट के जाँ
मेरी मय्यत वो सझाने आये

सो रहो मौत के पहलू में “फ़राज़”
नींद किस वक़्त न जाने आये

⁠⁠⁠
⁠⁠⁠✍🏼 अहमद फ़राज़

 

ग़म छुपाने के लिए

ग़म छुपाने के लिए दूर तलक जाते हैं,
दिल के जज़्बात कई बार तो थक जाते हैं.

रौशनी में ये ग़म-ए-हिज्र छुपाएं कैसे,
अश्क आँखों में ये मोती से झलक जाते हैं.

तुम से कहने को है इक बात हमारे दिल में,
तुम से मिलते ही कहने से झिझक जाते हैं.

तेरी सूरत पे अब इस चाँदनी को रश्क़ हुआ,
हुस्न के चर्चे तेरे सू-ए-फ़लक जाते हैं.

मुन्तज़िर हूँ कि कभी ख़्वाब तुम्हारा देखूँ,
ख़्वाब आँखों से मेरी दूर अटक जाते हैं.

जाके हसनैन बता हुस्न-ए-परीज़ाद को ये,
रोज़ अब हिज्र में हम मौत तलक जाते हैं.

~अली हसनैन

 

तुम हस्ते हो तो ..

तुम हस्ते हो तो फूलोंकी अदा लगते हो
और चलते हो तो इक बाद-साबा लगते हो.

कुछ न कहेना मेरे काँधे पे झुका के सर को
किनते मासूम हो तस्वीर-ए- वफा लगते हो.

बात करते हो तो सागर से खनक जाते हो
लहर का गीत हो कोयल की सदा लगते हो.

किस तरफ जाओगे जुल्फों के ऐ बादल लेकर
आज मचली हुयी सावन की घटा लगते हो.

तुम जिससे देखलो पीने की जरूरत क्या है?
जिंदगीभर जो रहे ऐसा नशा लगते हो.

मेने महसूस किआ तुम से जो बाते करके
तुम जमाने में जमाने से जुदा लगते हो.

– ‘ईशान’ विराणी

 

मिलेगा कहाँ से नशेमन सुहाना

ग़ज़ल

लगागा,लगागा,लगागा,लगागा

न कोई सहारा न कोई ठिकाना,
मिलेगा कहाँ से नशेमन सुहाना।

असीरों तलक जो, परिंदे उड़े हैं ,
उन्हें तो अभी है, जमीं पे बुलाना।

किया है बसेरा , सबा में सदा में ,
लगा था सताने , ज़माना सयाना।

नशा तो चढ़ा है, हमारी रज़ा से,
पड़ेगा हमें भी , खुदी को पिलाना।

कहे जा रहे हैं , बज़म में फ़साने,
अजीजां सुनाओ, नया ही तराना।

हमीं ने कहा था, मिटा दो किनारे,
कभी भी मिलेगा,गनीमत पुराना।
*
-कृष्णकांत भाटिया ‘कान्त ‘