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Tag: नज़्म

देखो सूर्य उगा पूरब में

देखो सूर्य उगा पूरब में ,
धरती का सुनापन हरने ..

ज्यों ज्यों सूरज चढ़ता जाता ,
(धरती) उसका रूप निखरता जाता ..

आतुर है वो पिया मिलन को,
सजी है मिलने अपने सजन को .

सर पे है हरियाली चुनर,
पंछी के कलरव के घूँघर..

इठलाती है , बलखाती है ,
थोडा थोड़ा शरमाती है ..

वो तो पगली सूर्य -प्यार में ,
तपती रहती इंतज़ार में ..

पर है सूर्य अभी भी व्यस्त
अपने काम में बिलकुल मस्त !

बिना मिले ही चलता जाता ,
पश्चिम की ओर ढलता जाता ..

देखो ये कैसा चित्तचोर,
सुना न उसके मन का शोर..

हाँ, अब आँखे लाल हुई है.
देखो ना फिर शाम हुई है…

वो न रुकेगा जान गई वो
खुद से हार मान गई वो..

उसने न रोका सूरज ढलते
सूरज बोला चलते-चलते..

“वादा है ये , निभाऊँगा मैं,
कल फिर मिलने आऊँगा मैं।”

✍🏼 शबनम

 

तेरी बातें ही सुनाने आये

तेरी बातें ही सुनाने आये
दोस्त भी दिल ही दुखाने आये

फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आये

ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आये

इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आये

अजनबी दोस्त हमें देख के हम
कुछ तुझे याद दिलाने आये

दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आये

अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आये

क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आये

आ ना जाए कहीं फिर लौट के जाँ
मेरी मय्यत वो सझाने आये

सो रहो मौत के पहलू में “फ़राज़”
नींद किस वक़्त न जाने आये

⁠⁠⁠
⁠⁠⁠✍🏼 अहमद फ़राज़