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Category: अली हसनैन

हमने दिल और तेरे हाथ में पत्थर रक्खा

हमने दिल और तेरे हाथ में पत्थर रक्खा,
जब कि ये हमने बहुत सोच समझ कर रक्खा.

याद रखना कि ये शीशे की तरह टूट न जाए,
दिल ये महफ़ूज़ अभी तक था जहाँ पर रक्खा.

अब हिफ़ाज़त की रही तुझपे ही ज़िम्मेदारी,
अब तलक हमने ख़याल इसका बराबर रक्खा.

क्या कहा इश्क़ में कोताही किया करता हूँ,
तूने मुझ पर ग़लत इल्ज़ाम सरासर रक्खा.

हम में से किसने सरेआम तअल्लुक तोड़ा,
दुनिया ने देख तेरे नाम को बरतर रक्खा.

✍🏼 अली हसनैन

ہم نے دل اور تیرے ہاتھ میں پتھر رکھا،
جب کہ یہ ہم نے بہت سوچ سمجھ کر رکھا.

یاد رکھنا کہ یہ شیشے کی طرح ٹوٹ نہ جائے،
دل یہ محفوظ ابھی تک تھا جہاں پر رکھا.

اب حفاظت کی رہی تجھپے ہی ذمہ داری،
اب تلک ہم نے خیال اس کا برابر رکھا.

کیا کہا عشق میں کوتاہی کیا کرتا ہوں،
تو نے مجھ پر غلط الزام سراسر رکھا.

ہم میں سے کس نے سرعام تعلق توڑا،
دنیا نے دیکھ تیرے نام کو برتر رکھا.

✍🏼 علی حسنین

 

ग़म छुपाने के लिए

ग़म छुपाने के लिए दूर तलक जाते हैं,
दिल के जज़्बात कई बार तो थक जाते हैं.

रौशनी में ये ग़म-ए-हिज्र छुपाएं कैसे,
अश्क आँखों में ये मोती से झलक जाते हैं.

तुम से कहने को है इक बात हमारे दिल में,
तुम से मिलते ही कहने से झिझक जाते हैं.

तेरी सूरत पे अब इस चाँदनी को रश्क़ हुआ,
हुस्न के चर्चे तेरे सू-ए-फ़लक जाते हैं.

मुन्तज़िर हूँ कि कभी ख़्वाब तुम्हारा देखूँ,
ख़्वाब आँखों से मेरी दूर अटक जाते हैं.

जाके हसनैन बता हुस्न-ए-परीज़ाद को ये,
रोज़ अब हिज्र में हम मौत तलक जाते हैं.

~अली हसनैन