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तू गुनगुनाये तो

तू गुनगुनाये तो ग़ज़ल पे निख़ार आ जाता है,
बदली बरसती है, खिज़ा पे ज़माल आ जाता है।

दिल धड़कता है हर पल, साँसें तेज चलती हैं ,
चाँदनी के नाजुक जिस्म में, उबाल आ जाता है।

अज़नबी की तरह मिल जाए तू किसी मोड़ पर,
बिखरे रिश्तों के, लम्हों का ख्याल आ जाता है।

जवानी के जोश में नादानियाँ कौन नहीं करता ?
जुबाँ पे मेरी यही दर्द भरा सवाल आ जाता है।

हम थे जो तूफानों का रुख मोड़ दिया करते थे,
आज तो किनारों पर भी भूचाल आ जाता है।
*
✍🏼 कृष्णकांत भाटिया ‘कान्त ‘

 

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